श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.297.32 
सावित्र्युवाच
हृतं पुरा मे श्वशुरस्य धीमत:
स्वमेव राज्यं लभतां स पार्थिव:।
जह्यात् स्वधर्मं न च मे गुरुर्यथा
द्वितीयमेतद् वरयामि ते वरम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
सावित्री बोली, 'मेरे बुद्धिमान श्वसुर को उनका राज्य पुनः प्राप्त हो, जो उनसे पहले छीन लिया गया था, तथा मेरे पूज्य गुरु महाराज द्युमत्सेन अपना धर्म कभी न त्यागें; यह दूसरा वर मैं आपसे मांगती हूँ।'
 
Savitri said, 'May my wise father-in-law regain his kingdom which was taken away from him earlier, and may my revered Guru Maharaja Dyumatsena never abandon his religion; this is the second boon I ask from you.' 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)