श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.297.22 
तपसा गुरुभक्त्या च भर्तु: स्नेहाद् व्रतेन च।
तव चैव प्रसादेन न मे प्रतिहता गति:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
तप, गुरुभक्ति, पतिप्रेम, व्रतों का पालन और आपकी कृपा से मेरी गति कहीं भी नहीं रुक सकती॥22॥
 
With penance, devotion to Guru, love for my husband, observance of fasts and your grace, my speed cannot stop anywhere. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)