श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 296: सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान‍्के साथ उसका वनमें जाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.296.8 
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्त्वा द्युमत्सेनो विरराम महामना:।
तिष्ठन्ती चैव सावित्री काष्ठभूतेव लक्ष्यते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महामनस्वी द्युमत्सेन चुप हो गए। सावित्री एक स्थान पर खड़ी होकर लकड़ी के समान देखने लगी।
 
Markandeyji says- Yudhishthira! After saying this, the great-minded Dyumatsena became silent. Savitri stood at one place and looked like a log. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)