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श्लोक 3.291.70  |
ततो देवर्षिसहित: सरितं गोमतीमनु।
दशाश्वमेधानाजह्रे जारूथ्यान् स निरर्गलान्॥ ७०॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् श्री रघुनाथजी ने अपने देवर्षियों के साथ गोमती नदी के तट पर जाकर दस अश्वमेध यज्ञ किए, जो प्रशंसनीय थे और जिनमें भोजन आदि की इच्छा से आए हुए याचकों के लिए कभी द्वार बंद नहीं किया जाता था॥70॥ |
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| Thereafter, Shri Raghunath ji along with his devarshis went to the banks of river Gomti and performed ten Ashwamedha Yagya, which were worthy of praise and in which the door was never closed for the petitioners who came with the desire of food etc. 70॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि श्रीरामाभिषेके एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २९१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें श्रीरामाभिषेकविषयक दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९१॥
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