श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 55-56h
 
 
श्लोक  3.291.55-56h 
अथैनान् राघव: काले समानीयाभिपूज्य च॥ ५५॥
विसर्जयामास तदा रत्नै: संतोष्य सर्वश:।
 
 
अनुवाद
तब श्री रघुनाथजी ने उचित समय पर सबको अपने पास बुलाकर उनका यथोचित सत्कार किया, रत्नों से उन्हें संतुष्ट किया और सब वानरों और भालुओं को विदा किया॥55 1/2॥
 
Then Sri Raghunath called everybody to himself at the appropriate time and honored them appropriately. He satisfied them with the gift of gems and sent all the monkeys and bears away. ॥ 55 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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