श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 51-54h
 
 
श्लोक  3.291.51-54h 
तत: सीतां पुरस्कृत्य राम: सौमित्रिणा सह॥ ५१॥
सुग्रीवप्रमुखैश्चैव सहित: सर्ववानरै:।
विधाय रक्षां लङ्कायां विभीषणपुरस्कृत:॥ ५२॥
संततार पुनस्तेन सेतुना मकरालयम्।
पुष्पकेण विमानेन खेचरेण विराजता॥ ५३॥
कामगेन यथामुख्यैरमात्यै: संवृतो वशी।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् जितेन्द्रिय भगवान् श्री राम लंकापुरी की सुरक्षा का प्रबंध करके, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि श्रेष्ठ वानरों, विभीषण और प्रधान सचिवों के साथ सीता को आगे करके, इच्छापूर्वक चलने वाले, आकाश में उड़ने वाले, शोभायमान पुष्प-विमान पर आरूढ़ होकर, पूर्वोक्त सेतु के द्वारा पुनः मकरालय समुद्र को पार कर गए। 51—53 1/2॥
 
Thereafter, Jitendriya Lord Shri Ram, after arranging for the security of Lankapuri, took Sita in front along with Lakshman, Sugriva etc., all the best monkeys, Vibhishana and the chief secretaries, and mounted on a wish-moving, sky-flying, graceful flower-plane, crossed the Makaralaya Samudra again over the aforesaid bridge. 51—53 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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