श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.291.15 
योऽप्यस्या हर्षसम्भूतो मुखरागस्तदाभवत्।
क्षणेन स पुनर्नष्टो नि:श्वास इव दर्पणे॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जैसे श्वास लेने से दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब धूमिल हो जाता है, वैसे ही सीता के मुख पर उस समय जो हर्ष के कारण चमक फैल रही थी, वह क्षण भर में फिर लुप्त हो गई ॥15॥
 
Just as the reflection of the face in the mirror becomes tarnished due to breathing, similarly the glow caused by joy that was spreading on Sita's face at that time vanished again in a moment. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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