श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.291.10 
उवाच रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कित:।
गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत् कार्यं तन्मया कृतम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी के मन में यह संदेह उत्पन्न हुआ कि सम्भव है कि सीता किसी पुरुष के स्पर्श से अपवित्र हो गई हों; अतः उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता से स्पष्ट शब्दों में कहा - 'विदेहकुमारी! मैंने तुम्हें रावण की कैद से मुक्त कर दिया है। अब तुम जाओ। मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है॥10॥
 
A doubt arose in the mind of Shri Ramchandraji that it is possible that Sita may have become impure by the touch of a man; therefore, he said to Videhanandini Sita in clear words - 'Videh Kumari! I have freed you from Ravana's captivity. Now you go. I have completed my duty.॥10॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd