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mahabharat 3.29.2: हे सुन्दरी! जो मनुष्य क्रोध को वश में कर लेता है, वह उन्नति करता है और जो क्रोध का वेग सहन नहीं कर सकता, उसके लिए वह भयंकर क्रोध विनाशकारी हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.29.2 
यो हि संहरते क्रोधं भवस्तस्य सुशोभने।
य: पुन: पुरुष: क्रोधं नित्यं न सहते शुभे।
तस्याभावाय भवति क्रोध: परमदारुण:॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे सुन्दरी! जो मनुष्य क्रोध को वश में कर लेता है, वह उन्नति करता है और जो क्रोध का वेग सहन नहीं कर सकता, उसके लिए वह भयंकर क्रोध विनाशकारी हो जाता है।
 
O beautiful one! One who controls his anger progresses and for a person who cannot bear the force of anger, that terrible anger becomes destructive for him. 2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)