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mahabharat 3.29.14: कृष्ण! ऋषिगण क्रोध पर विजय पाने की ही प्रशंसा करते हैं। ऋषियों का मानना ​​है कि इस संसार में क्षमाशील संत की ही सदैव विजय होती है। 14॥   |   mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.29.14 
मन्योर्हि विजयं कृष्णे प्रशंसन्तीह साधव:।
क्षमावतो जयो नित्यं साधोरिह सतां मतम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण! ऋषिगण क्रोध पर विजय पाने की ही प्रशंसा करते हैं। ऋषियों का मानना ​​है कि इस संसार में क्षमाशील संत की ही सदैव विजय होती है। 14॥
 
Krishna! Sages praise only conquering anger. The saints believe that a forgiving saint always wins in this world. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)