श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  3.282.58-59 
नाध्यवास्यद् यदा कश्चित् सागरस्य विलङ्घनम्॥ ५८॥
तत: पितरमाविश्य पुप्लवेऽहं महार्णवम्।
शतयोजनविस्तीर्णं निहत्य जलराक्षसीम्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
'जब कोई भी समुद्र पार करने का साहस नहीं कर पा रहा था, तब मैंने अपने पिता वायु का रूप धारण करके सौ योजन चौड़े समुद्र को पार किया। उस समय समुद्र के जल में एक राक्षसी रहती थी, जिसे मैंने तब मारा जब वह मेरा मार्ग रोक रही थी।
 
‘When no one could dare to cross the ocean, then I entered the form of my father Vayu and crossed the ocean which was hundred yojanas wide. At that time there was a demoness living in the water of the ocean, whom I killed when she was obstructing my path.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)