श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 276: देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाकर रावणके अत्याचारसे बचानेके लिये प्रार्थना करना तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका रीछ और वानरयोनिमें संतान उत्पन्न करना एवं दुन्दुभी गन्धर्वीका मन्थरा बनकर आना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.276.16 
सा तद्वच: समाज्ञाय तथा चक्रे मनोजवा।
इतश्चेतश्च गच्छन्ती वैरसन्धुक्षणे रता॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वह मन के समान वेग से चलने लगी। ब्रह्माजी के वचनों को उसने भली-भाँति समझ लिया और तद्नुसार आचरण करने लगी। वह इधर-उधर घूमने लगी और शत्रुता की अग्नि प्रज्वलित करने लगी॥16॥
 
She moved as fast as the mind. She understood Brahmaji's words well and acted accordingly. She started moving here and there and igniting the fire of enmity.॥ 16॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि वानराद्युत्पत्तौ षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें वानर आदिकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)