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mahabharat 3.275.31: ब्रह्माजी ने कहा- शत्रु का नाश करो! राक्षस योनि में जन्म लेने पर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्म में प्रवृत्त नहीं होती; इसलिए (माँगे हुए वरदान के अतिरिक्त) मैं तुम्हें अमरत्व भी प्रदान करता हूँ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 3.275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.275.31 
ब्रह्मोवाच
यस्माद् राक्षसयोनौ ते जातस्यामित्रकर्शन।
नाधर्मे धीयते बुद्धिरमरत्वं ददानि ते॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी ने कहा- शत्रु का नाश करो! राक्षस योनि में जन्म लेने पर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्म में प्रवृत्त नहीं होती; इसलिए (माँगे हुए वरदान के अतिरिक्त) मैं तुम्हें अमरत्व भी प्रदान करता हूँ॥31॥
 
Brahmaji said- Destroy the enemy! Even after being born in a demon's womb, your intellect does not indulge in unrighteousness; Therefore (in addition to the boon you asked for) I also give you immortality. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)