Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.272.61: इस प्रकार शत्रुसंहारक राक्षसराज हिरण्यकशिपु का वध करके, कमलनेत्र भगवान हरि समस्त लोकों के हित के लिए पुनः दूसरे रूप में प्रकट हुए।   |   mahabharat अध्याय 3.272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  3.272.61 
एवं निहत्य भगवान् दैत्येन्द्रं रिपुघातिनम्।
भूयोऽन्य: पुण्डरीकाक्ष: प्रभुर्लोकहिताय च॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार शत्रुसंहारक राक्षसराज हिरण्यकशिपु का वध करके, कमलनेत्र भगवान हरि समस्त लोकों के हित के लिए पुनः दूसरे रूप में प्रकट हुए।
 
Having thus killed the enemy-killing demon king Hiranyakashipu, the lotus-eyed Lord Hari once again appeared in another form for the benefit of all the worlds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)