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mahabharat 3.272.55: इस प्रकार यज्ञवराह रूप धारण करके भगवान् ने जल में प्रवेश किया और एक दाँत से पृथ्वी को उठाकर पुनः अपने स्थान पर रख दिया ॥55॥   |   mahabharat अध्याय 3.272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.272.55 
भूत्वा यज्ञवराहो वै अप: सम्प्राविशत् प्रभु:।
दंष्ट्रेणैकेन चोद्‍धृत्य स्वे स्थाने न्यविशन्महीम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार यज्ञवराह रूप धारण करके भगवान् ने जल में प्रवेश किया और एक दाँत से पृथ्वी को उठाकर पुनः अपने स्थान पर रख दिया ॥55॥
 
Thus, taking the form of Yajnavaraha, the Lord entered the water, lifted the Earth with a single tooth and placed it back in its place. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)