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mahabharat 3.272.43: तत्पश्चात् भगवान ने प्रजा की सृष्टि के विषय में विचार किया। इस चिंतन से भगवान की नाभि से सनातन कमल प्रकट हुआ ॥43॥   |   mahabharat अध्याय 3.272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  3.272.43 
प्रध्यानसमकालं तु प्रजाहेतो: सनातन:।
ध्यातमात्रे तु भगवन् नाभ्यां पद्म: समुत्थित:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भगवान ने प्रजा की सृष्टि के विषय में विचार किया। इस चिंतन से भगवान की नाभि से सनातन कमल प्रकट हुआ ॥43॥
 
After that God thought about the creation of the people. With this contemplation, the eternal lotus appeared from the navel of God. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)