श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.272.34 
घोरस्वरा विनदिनस्तडिन्मालावलम्बिन:।
समुत्तिष्ठन् दिश: सर्वा विवर्षन्त: समन्तत:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वे बिजली की मालाओं से प्रकाशित बादल भयंकर गरजते हुए सब दिशाओं में फैल जाते हैं और सर्वत्र वर्षा करने लगते हैं॥ 34॥
 
‘Roaring with a terrifying voice those clouds, illuminated by garlands of lightning, spread in all directions and begin to pour rain everywhere.॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)