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mahabharat 3.272.11: राजाओं की सभा में तुम्हें सदैव महाराज युधिष्ठिर का सेवक कहलाना चाहिए। यदि तुम यह शर्त स्वीकार कर लो, तो मैं तुम्हारे प्राण छोड़ सकता हूँ। युद्ध में पराजित के लिए विजयी पुरुष का यही नियम है।॥11॥   |   mahabharat अध्याय 3.272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.272.11 
दासोऽस्मीति तथा वाच्यं संसत्सु च सभासु च।
एवं ते जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधि:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
राजाओं की सभा में तुम्हें सदैव महाराज युधिष्ठिर का सेवक कहलाना चाहिए। यदि तुम यह शर्त स्वीकार कर लो, तो मैं तुम्हारे प्राण छोड़ सकता हूँ। युद्ध में पराजित के लिए विजयी पुरुष का यही नियम है।॥11॥
 
You should always introduce yourself as the servant of Maharaja Yudhishthira in the assemblies of kings. If you accept this condition, I can spare your life. This is the rule of the victorious man for the defeated in a war.'॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)