श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 270: द्रौपदीद्वारा जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.270.1 
वैशम्पायन उवाच
ततो घोरतर: शब्दो वने समभवत् तदा।
भीमसेनार्जुनौ दृष्ट्वा क्षत्रियाणाममर्षिणाम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: हे जनमेजय! तत्पश्चात, वन में भीमसेन और अर्जुन को देखकर क्रोध से भरे हुए क्षत्रियों का कोलाहल सुनाई दिया॥1॥
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya! Thereafter, the din of the Kshatriyas filled with resentment at seeing Bhimasena and Arjuna in the forest was heard. ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)