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mahabharat 3.268.2: अरे मूर्ख! मेरे पति पाण्डव बड़े यशस्वी हैं, सदा अपने धर्म का पालन करते हैं, यक्षों और राक्षसों के समूह में भी युद्ध करने में समर्थ हैं, देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी और महायोद्धा हैं। उनका क्रोध तीक्ष्ण विष वाले सर्पों के समान भयंकर है। उनके मान के विरुद्ध ऐसी ओछी बातें कहते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 3.268: द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 268: द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.268.2 
यशस्विनस्तीक्ष्णविषान् महारथा-
नभिब्रुवन् मूढ न लज्जसे कथम्।
महेन्द्रकल्पान्निरतान् स्वकर्मसु
स्थितान् समूहेष्वपि यक्षरक्षसाम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
अरे मूर्ख! मेरे पति पाण्डव बड़े यशस्वी हैं, सदा अपने धर्म का पालन करते हैं, यक्षों और राक्षसों के समूह में भी युद्ध करने में समर्थ हैं, देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी और महायोद्धा हैं। उनका क्रोध तीक्ष्ण विष वाले सर्पों के समान भयंकर है। उनके मान के विरुद्ध ऐसी ओछी बातें कहते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?॥ 2॥
 
Oh fool! My husband Pandavas are very famous, always follow their religion, are capable of fighting even in groups of Yakshas and demons, are powerful like Devraj Indra and are great warriors. Their anger is as terrible as that of snakes with sharp poison. How can you not feel ashamed of saying such cheap things against their honour?॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)