श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 267: जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद  »  श्लोक 2-5h
 
 
श्लोक  3.267.2-5h 
कोटिकास्यवच: श्रुत्वा शैब्यं सौवीरकोऽब्रवीत्।
यदा वाचं व्याहरन्त्यामस्यां मे रमते मन:॥ २॥
सीमन्तिनीनां मुख्यायां विनिवृत्त: कथं भवान्।
एतां दृष्ट्वा स्त्रियो मेऽन्या यथा शाखामृगस्त्रिय:॥ ३॥
प्रतिभान्ति महाबाहो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते।
दर्शनादेव हि मनस्तया मेऽपहृतं भृशम्॥ ४॥
तां समाचक्ष्व कल्याणीं यदि स्याच्छैब्य मानुषी।
 
 
अनुवाद
कोटिकास्य के वचन सुनकर सौवीरराज जयद्रथ ने उससे कहा- 'शैभ्य! जब वह परम सुन्दरी कन्या तुमसे बातें कर रही थी, तब मेरा मन उसमें रम गया था। तुम उसे साथ लिए बिना कैसे लौट आए? हे महाबाहो! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, उसे देखकर अन्य स्त्रियाँ मुझे बंदरिया के समान प्रतीत होती हैं। उसने केवल एक दृष्टि से ही मेरा मन जीत लिया है। शैभ्य! यदि वह मनुष्या है, तो उस सुन्दरी कन्या के विषय में मुझे ठीक-ठीक बताओ।'॥2-4 1/2॥
 
On hearing Kotikasya's words, the Sauvir king Jayadratha said to him- 'Shaibya! When that most beautiful girl was talking to you, my mind was engrossed in her. How did you return without taking her along? O mighty-armed one! I tell you the truth, on seeing her, other women appear to me as if they were monkeys. She has completely won over my heart by merely looking at her. Shaibya! If she is a human being, then tell me exactly about that beautiful girl.'॥ 2-4 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)