बुद्धॺाभिजानामि नरेन्द्रपुत्र
न मादृशी त्वामभिभाष्टुमर्हति।
न त्वेह वक्तास्ति तवेह वाक्य-
मन्यो नरो वाप्यथवापि नारी॥ २॥
अनुवाद
‘राजकुमार! मैंने विचार करके यह समझ लिया है कि मुझ जैसी पतिपरायणा स्त्री को आपके समान किसी अन्य पुरुष से बात नहीं करनी चाहिए; परंतु यहाँ कोई दूसरा पुरुष या स्त्री नहीं है जो आपके प्रश्न का उत्तर दे सके॥ 2॥
‘Prince! I have thought over it and understand that a woman like me who is devoted to her husband should not talk to another man like you; but there is no other man or woman here who can answer your question.॥ 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥