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mahabharat 3.263.45-46: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन को सुनकर द्रौपदी सहित पाण्डवों का मन शान्त हो गया। उनकी सारी चिन्ताएँ दूर हो गईं और वे भगवान से इस प्रकार बोले - 'विभु! गोविन्द! आपको अपना सहायक और रक्षक पाकर हम अनेक कठिन संकटों को उसी प्रकार पार कर गए हैं, जैसे डूबता हुआ मनुष्य जहाज का सहारा पाकर समुद्र पार कर जाता है।'   |   mahabharat अध्याय 3.263:   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 263:  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  3.263.45-46 
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वेरितं केशवस्य बभूवु: स्वस्थमानसा:।
द्रौपद्या सहिता: पार्थास्तमूचुर्विगतज्वरा:॥ ४५॥
त्वया नाथेन गोविन्द दुस्तरामापदं विभो।
तीर्णा: प्लवमिवासाद्य मज्जमाना महार्णवे॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन को सुनकर द्रौपदी सहित पाण्डवों का मन शान्त हो गया। उनकी सारी चिन्ताएँ दूर हो गईं और वे भगवान से इस प्रकार बोले - 'विभु! गोविन्द! आपको अपना सहायक और रक्षक पाकर हम अनेक कठिन संकटों को उसी प्रकार पार कर गए हैं, जैसे डूबता हुआ मनुष्य जहाज का सहारा पाकर समुद्र पार कर जाता है।'
 
Vaishampayana says - Janamejaya! On hearing this statement of Lord Krishna, the minds of the Pandavas including Draupadi became peaceful. All their worries vanished and they spoke to the Lord in this manner - 'Vibhu! Govind! By finding you as our helper and protector, we have crossed many difficult difficulties in the same way as a drowning man crosses the ocean by getting the support of a ship.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)