| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना » श्लोक 6-7 |
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| | | | श्लोक 3.261.6-7  | देवा: साध्यास्तथा विश्वे तथैव च महर्षय:।
यामा धामाश्च मौद्गल्य*गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥ ६॥
एषां देवनिकायानां पृथक् पृथगनेकश:।
भास्वन्त: कामसम्पन्ना लोकास्तेजोमया: शुभा:॥ ७॥ | | | | | | अनुवाद | | मुद्गल! साध्य, विश्वेदेव, महर्षिगण, यम, धाम, गन्धर्व और अप्सरा इन सब देवताओं के समूहों के अनेकों प्रकाशमान लोक हैं, जो इच्छानुसार भोगों से युक्त, उज्ज्वल और शुभ हैं। 6-7॥ | | | | Mudgal! There are many different luminous worlds of all these groups of gods, Sadhya, Vishvedev, Maharshigan, Yam, Dham, Gandharva and Apsara, which are full of enjoyments as per wish, bright and auspicious. 6-7॥ | | ✨ ai-generated | | |
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