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श्लोक 3.261.51  |
वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्त्वा भगवान् व्यास: पाण्डवनन्दनम्।
जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति॥ ५१॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! युधिष्ठिर से ऐसा कहकर परम बुद्धिमान भगवान व्यास पाण्डुनन्दन तपस्या हेतु अपने आश्रम को चले गए ॥51॥ |
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| Vaishampayanji says – Janamejaya! Saying this to Yudhishthira, the most intelligent Lord Vyas Pandunandan went back to his ashram for penance. 51॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि व्रीहिद्रौणिकपर्वणि मुद्गलदेवदूतसंवादे एकषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत व्रीहिद्रौणिकपर्वमें मुद्गल-देवदूत-संवादविषयक
दो सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६१॥ |
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