श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.261.45 
इत्युक्त्वा स मुनिर्वाक्यं देवदूतं विसृज्य तम्।
शिलोञ्छवृत्तिर्धर्मात्मा शममातिष्ठदुत्तमम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर मुद्गल मुनि ने उस देवदूत को विदा कर दिया और सदाचार और उत्तम आचरण से जीवन निर्वाह करने वाले वे पुण्यात्मा महर्षि शम-दम आदि नियमों का उत्तम रीति से पालन करने लगे ॥45॥
 
Saying this, Mudgal Muni sent the angel away and that virtuous Maharishi, who lived his life by virtue of virtue and noble conduct, started following the rules of Sham-Dum etc. in the best manner. 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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