श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  3.261.10-11 
बीभत्समशुभं वापि तत्र किंचिन्न विद्यते।
मनोज्ञा: सर्वतो गन्धा: सुखस्पर्शाश्च सर्वश:॥ १०॥
शब्दा: श्रुतिमनोग्राह्या: सर्वतस्तत्र वै मुने।
न शोको न जरा तत्र नायासपरिदेवने॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वहाँ कोई भी वस्तु घृणित या अशुभ नहीं है। वहाँ मधुर सुगंध, मधुर स्पर्श और कानों तथा मन को प्रसन्न करने वाले मधुर वचन सुनने को मिलते हैं। हे मुनि! स्वर्ग में न तो कोई दुःख है और न ही वृद्धावस्था। वहाँ थकान और करुण विलाप भी नहीं सुनाई देते। ॥10-11॥
 
There is nothing there that is hateful or inauspicious. There one can hear pleasant fragrances, soothing touches and sweet words that are pleasing to the ears and mind. O sage! There is no sorrow or old age in heaven. There one cannot hear even tiredness and pitiful lamentations. ॥10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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