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mahabharat 3.257.24-25h: इस प्रकार चिंताओं से घिरे हुए महाबली युधिष्ठिर के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘नाना प्रकार के सर्पों और मृगों से भरे हुए इस द्वैतवन को छोड़कर हम कहीं अन्यत्र चले जाएँ।’ ॥24 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  3.257.24-25h 
तस्य चिन्तापरीतस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मन:॥ २४॥
बहुव्यालमृगाकीर्णं त्यक्तुं द्वैतवनं वनम्।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार चिंताओं से घिरे हुए महाबली युधिष्ठिर के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘नाना प्रकार के सर्पों और मृगों से भरे हुए इस द्वैतवन को छोड़कर हम कहीं अन्यत्र चले जाएँ।’ ॥24 1/2॥
 
Thus, the thought arose in the mind of great Yudhishthira, who was surrounded by worries, that 'Let us leave this Dwaitavan, which is filled with various kinds of snakes and deer, and go somewhere else.' ॥24 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)