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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.257.2 
लाजैश्चन्दनचूर्णैश्च विकीर्य च जनास्तत:।
ऊचुर्दिष्टॺा नृपाविघ्न: समाप्तोऽयं क्रतुस्तव॥ २॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात सबने लावा और चंदन छिड़ककर कहा, "महाराज! आपका यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हो गया, यह बड़े सौभाग्य की बात है।"
 
Thereafter everyone scattered lava and sandalwood powder and said, "Maharaj! Your yajna was completed without any hindrance; it is a matter of great fortune."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)