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mahabharat 3.257.11-13h: तब महाबली राजा दुर्योधन ने उससे इस प्रकार कहा - 'वीर! तुम्हारा यह कथन सत्य है। नरश्रेष्ठ! जब दुष्ट पाण्डव मारे जाएँगे, तब राजसूय महायज्ञ के अन्त में तुम पुनः उसी प्रकार मेरा अभिवादन करोगे। 11-12 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति  »  श्लोक 11-13h
 
 
श्लोक  3.257.11-13h 
तमब्रवीन्महाराजो धार्तराष्ट्रो महायशा:॥ ११॥
सत्यमेतत् त्वयोक्तं हि पाण्डवेषु दुरात्मसु।
निहतेषु नरश्रेष्ठ प्राप्ते चापि महाक्रतौ॥ १२॥
राजसूये पुनर्वीर त्वमेवं वर्धयिष्यसि।
 
 
अनुवाद
तब महाबली राजा दुर्योधन ने उससे इस प्रकार कहा - 'वीर! तुम्हारा यह कथन सत्य है। नरश्रेष्ठ! जब दुष्ट पाण्डव मारे जाएँगे, तब राजसूय महायज्ञ के अन्त में तुम पुनः उसी प्रकार मेरा अभिवादन करोगे। 11-12 1/2॥
 
Then the great king Duryodhana said to him thus - 'Brave! This statement of yours is true. Narashrestha! When the evil Pandavas will be killed, at the end of the Mahayagya Rajasuya, you will again greet me in the same way. 11-12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)