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mahabharat 3.251.9-10h: मेरा प्रस्ताव समझो और वैसा ही करो। इससे तुम कृतज्ञ रहोगे। पाण्डवों के साथ उत्तम भ्रातृत्व का व्यवहार करो, उन्हें राजसिंहासन पर बिठाओ और उनका पैतृक राज्य उन्हें सौंप दो। इससे तुम्हें सुख मिलेगा॥9 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.251: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 251: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  3.251.9-10h 
क्रियामेतां समाज्ञाय कृतज्ञस्त्वं भविष्यसि।
सौभ्रात्रं पाण्डवै: कृत्वा समवस्थाप्य चैव तान्॥ ९॥
पित्र्यं राज्यं प्रयच्छैषां तत: सुखमवाप्स्यसि।
 
 
अनुवाद
मेरा प्रस्ताव समझो और वैसा ही करो। इससे तुम कृतज्ञ रहोगे। पाण्डवों के साथ उत्तम भ्रातृत्व का व्यवहार करो, उन्हें राजसिंहासन पर बिठाओ और उनका पैतृक राज्य उन्हें सौंप दो। इससे तुम्हें सुख मिलेगा॥9 1/2॥
 
Understand my proposal and do the same. You will be grateful for this. Treat the Pandavas with the best brotherhood and make them sit on the throne and hand over their ancestral kingdom to them. This will bring you happiness.॥9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)