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mahabharat 3.251.25: तब वे ब्राह्मण, जो व्रत का पालन करने वाले और वेदों के ज्ञाता थे, एकाग्रचित्त होकर मंत्र पढ़ते हुए जलती हुई अग्नि में घी और खीर की आहुति देने लगे॥25॥   |   mahabharat अध्याय 3.251: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 251: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.251.25 
जुह्वत्यग्नौ हवि: क्षीरं मन्त्रवत् सुसमाहिता:।
ब्राह्मणा वेदवेदाङ्गपारगा: सुदृढव्रता:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तब वे ब्राह्मण, जो व्रत का पालन करने वाले और वेदों के ज्ञाता थे, एकाग्रचित्त होकर मंत्र पढ़ते हुए जलती हुई अग्नि में घी और खीर की आहुति देने लगे॥25॥
 
Then the Brahmins, who strictly observed the fast and were experts in the Vedas, became concentrated and started offering ghee and kheer to the burning fire while reciting mantras. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)