श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.25.7 
तं धर्मराजो विमना इवाब्रवीत्
सर्वे ह्रिया सन्ति तपस्विनोऽमी।
भवानिदं किं स्मयतीव हृष्ट-
स्तपस्विनां पश्यतां मामुदीक्ष्य॥ ७॥
 
 
अनुवाद
तब धर्मराज युधिष्ठिर ने उदासीन भाव से पूछा - 'मुनि! ये सब तपस्वी मेरी यह दशा देखकर कुछ लज्जित हो रहे हैं, फिर भी आप इन सब महात्माओं के सामने मेरी ओर देखकर प्रसन्नतापूर्वक क्यों मुस्कुरा रहे हैं?'॥7॥
 
Then Dharmaraja Yudhishthira asked indifferently, 'Muni! All these ascetics are feeling a little embarrassed on seeing my condition, but why is it that you look at me and smile happily in front of all these great souls?'॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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