श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.25.6 
स सर्वविद् द्रौपदीं वीक्ष्य कृष्णां
युधिष्ठिरं भीमसेनार्जुनौ च।
संस्मृत्य रामं मनसा महात्मा
तपस्विमध्येऽस्मयतामितौजा:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अमित तेजस्वी और सर्वज्ञ महात्मा मार्कण्डेयजी द्रुपदकुमारी कृष्ण, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन (तथा नकुल-सहदेव) को देखकर मन ही मन श्री रामचन्द्रजी का स्मरण करके तपस्वियों के बीच मुस्कुराने लगे। 6॥
 
Amit Tejasvi and omniscient Mahatma Markandeyaji, after seeing Drupadkumari Krishna, Yudhishthir, Bhimsen, Arjun (and Nakul-Sahdev), started smiling among the ascetics, remembering Shri Ramchandraji in his mind. 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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