श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.25.4 
अपेत्य राष्ट्राद् वसतां तु तेषा-
मृषि: पुराणोऽतिथिराजगाम।
तमाश्रमं तीव्रसमृद्धतेजा
मार्कण्डेय: श्रीमतां पाण्डवानाम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तेजस्वी एवं तेजस्वी प्राचीन ऋषि मार्कण्डेय अपने राज्य से दूर वन में निवास करने वाले महापुरुष पाण्डवों के आश्रम में अतिथि बनकर आये। ॥4॥
 
The radiant and glorious ancient sage Mārkaṇḍeya came as a guest to the ashram of the noble Pandavas who were residing in the forest away from their kingdom. ॥4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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