| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान » श्लोक 2-3 |
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| | | | श्लोक 3.25.2-3  | यतींश्च राजा स मुनींश्च सर्वां-
स्तस्मिन् वने मूलफलैरुदग्रै:।
द्विजातिमुख्यानृषभ: कुरूणां
संतर्पयामास महानुभाव:॥ २॥
इष्टीश्च पित्र्याणि तथा क्रियाश्च
महावने वसतां पाण्डवानाम्।
पुरोहितस्तत्र समृद्धतेजा-
श्चकार धौम्य: पितृवन्नृपाणाम्॥ ३॥ | | | | | | अनुवाद | | कौरवों में श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने उस वन में रहने वाले समस्त यति, ऋषि और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उत्तम फल-मूल देकर तृप्त किया। परम तेजस्वी पुरोहित धौम्य अपने पिता के समान उस महान वन में रहने वाले राजकुमार पाण्डवों के लिए यज्ञ, पितृ-श्राद्ध आदि शुभ कर्म करते थे। | | | | King Yudhishthira, the best of Kurus, satisfied all the Yatis, sages and best Brahmins living in that forest with the best fruits and roots. The very brilliant priest Dhaumya, like his father, used to perform the Yagyas, Pitra-Shraddha and other good deeds for the prince Pandavas who lived in that great forest. 2-3॥ | | ✨ ai-generated | | |
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