| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान » श्लोक 17 |
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| | | | श्लोक 3.25.17  | सत्येन धर्मेण यथार्हवृत्त्या
ह्रिया तथा सर्वभूतान्यतीत्य।
यशश्च तेजश्च तवापि दीप्तं
विभावसोर्भास्करस्येव पार्थ॥ १७॥ | | | | | | अनुवाद | | हे कुन्तीपुत्र! सत्य, धर्म, सदाचार और शील आदि गुणों के कारण आप समस्त प्राणियों से श्रेष्ठ हैं। आपकी कीर्ति और तेज अग्नि और सूर्य के समान चमक रहे हैं॥ 17॥ | | | | O son of Kunti! You are elevated above all beings because of your virtues like truth, religion, proper conduct and modesty. Your fame and glory are shining like fire and the sun.॥ 17॥ | | ✨ ai-generated | | |
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