श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.25.14 
धात्रा विधिर्यो विहित: पुराणै-
स्तं पूजयन्तो नरवर्य सन्त:।
सप्तर्षय: पार्थ दिवि प्रभान्ति
नेशे बलस्येति चरेदधर्मम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीकुमार, मनुष्यों में श्रेष्ठ! प्रजापति द्वारा प्राचीन वेदों के माध्यम से विहित अग्निहोत्र आदि कर्मों का आदर करने के कारण ही ऋषिगण और सप्तर्षि देवलोक में प्रकाशित हो रहे हैं। अतः अपने को शक्तिशाली मानकर कभी भी अधर्म का आचरण नहीं करना चाहिए। 14॥
 
Kuntikumar is the best among humans! It is because of respecting the rituals like Agnihotra etc. which have been prescribed by the Creator through the ancient Vedas, the sages and Saptarishis are getting published in the world of gods. Therefore, one should never behave unrighteously considering oneself powerful. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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