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mahabharat 3.25.10: दशरथपुत्र श्री राम सर्वथा निष्पाप थे। इन्द्र उनका दूसरा रूप थे। वे यमराज के नियन्ता और नमुचि आदि दैत्यों के संहारक थे, फिर भी उस महात्मा ने पिता की आज्ञा से वन में रहना अपना कर्तव्य समझा॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 25: महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.25.10 
सहस्रनेत्रप्रतिमो महात्मा
यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता।
पितुर्निदेशादनघ: स्वधर्मं
वासं वने दाशरथिश्चकार॥ १०॥
 
 
अनुवाद
दशरथपुत्र श्री राम सर्वथा निष्पाप थे। इन्द्र उनका दूसरा रूप थे। वे यमराज के नियन्ता और नमुचि आदि दैत्यों के संहारक थे, फिर भी उस महात्मा ने पिता की आज्ञा से वन में रहना अपना कर्तव्य समझा॥10॥
 
Dasharatha's son Shri Ram was completely sinless. Indra was his other form. He was the controller of Yamraj and the destroyer of demons like Namuchi, yet that great soul considered it his duty to live in the forest on the orders of his father.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)