श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.230.58 
अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम्।
आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहा:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
जिसने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में कर लिया है, जो आत्मसंयमी, शुद्ध, सदा आलस्य से रहित, आस्तिक और भक्त है, उस पुरुष को ग्रह कभी व्याकुल नहीं करते; वे उसे दूर से ही त्याग देते हैं ॥ 58॥
 
The one who has withdrawn all his senses, who is self-controlled, pure, always free from laziness, a believer and a devotee, that person is never disturbed by the planets; they abandon him from a distance. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)