श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  3.230.51 
गन्धर्वाश्चापि यं दिव्या: संविशन्ति नरं भुवि।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहो गान्धर्व एव स:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
दिव्य गन्धर्वों से आविष्ट भूतल पर स्थित मनुष्य भी शीघ्र ही मदोन्मत्त हो जाता है। इसे गन्धर्वग्रह का ही विघ्न समझना चाहिए ॥51॥
 
A person on the ground level who is possessed by the divine Gandharvas also soon becomes intoxicated. This should be considered as the hindrance of ‘Gandharvagraha’ only. 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)