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mahabharat 3.23.7: जैसे पिता अपने पुत्रों के प्रति स्नेह रखता है, वैसे ही महान कुरु महात्मा युधिष्ठिर ने भी उन सभी के प्रति आन्तरिक स्नेह प्रदर्शित किया। वे भी उन महान युधिष्ठिर के प्रति उसी प्रकार समर्पित थे, जैसे पुत्र अपने पिता के प्रति होता है। 7॥   |   mahabharat अध्याय 3.23: पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 23: पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.23.7 
पितेव पुत्रेषु स तेषु भावं
चक्रे कुरूणामृषभो महात्मा।
ते चापि तस्मिन् भरतप्रबर्हे
तदा बभूवु: पितरीव पुत्रा:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जैसे पिता अपने पुत्रों के प्रति स्नेह रखता है, वैसे ही महान कुरु महात्मा युधिष्ठिर ने भी उन सभी के प्रति आन्तरिक स्नेह प्रदर्शित किया। वे भी उन महान युधिष्ठिर के प्रति उसी प्रकार समर्पित थे, जैसे पुत्र अपने पिता के प्रति होता है। 7॥
 
Just as a father has affection for his sons, similarly the great Kurus Mahatma Yudhishthir showed his inner affection towards all of them. He too was as devoted to that great Yudhishthir as a son is to his father. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)