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mahabharat 3.224.4: अतः उसने राक्षसों की सेना छीन ली, किन्तु आपके पराक्रम से मैं बच गई। हे देवेन्द्र! अब मैं आपकी आज्ञा से किसी अजेय योद्धा को अपना पति बनाना चाहती हूँ॥ 4॥   |   mahabharat अध्याय 3.224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.224.4 
सा हृतानेन भगवन् मुक्ताहं त्वद्‍बलेन तु।
त्वया देवेन्द्र निर्दिष्टं पतिमिच्छामि दुर्जयम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अतः उसने राक्षसों की सेना छीन ली, किन्तु आपके पराक्रम से मैं बच गई। हे देवेन्द्र! अब मैं आपकी आज्ञा से किसी अजेय योद्धा को अपना पति बनाना चाहती हूँ॥ 4॥
 
Therefore, he took away the army of demons, but I was saved by your valour. O Lord! Devendra! Now, as per your orders, I want to make any unconquerable warrior my husband.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)