मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन! ऐसा निश्चय करके अग्रिदेव ने गार्हपत्य अग्नि का आश्रय लिया और अपनी ज्वालाओं से स्वर्ग के समान चमकने वाली उन ऋषि-पत्नियों को स्पर्श करके और देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न होने लगे॥36॥
Markandeyaji says- Rajan! Having decided this, Agridev took shelter in the Garhapatya fire and by touching and seeing those sage-wives who were shining like heaven with their flames, he started feeling very happy. 36॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥