श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.224.35 
नैता: शक्या मया द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्तत:।
गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात् पश्याम्यभीक्ष्णश:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
‘मैं उन्हें अकारण देख भी नहीं सकता, स्पर्श भी नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में यदि मैं गार्हपत्य अग्नि में प्रवेश करूँ, तो मुझे बार-बार उनके दर्शन का अवसर मिल सकता है।’॥35॥
 
‘I cannot see them or even touch them without reason. In such a condition, if I enter the Garhapatya fire, then I can get the opportunity to see them again and again.’॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)