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श्लोक 3.217.8  |
पुराङ्गिरा महाबाहो चचार तप उत्तमम्।
आश्रमस्थो महाभागो हव्यवाहं विशेषयन्।
तथा स भूत्वा तु तदा जगत् सर्वं व्यकाशयत्॥ ८॥ |
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| अनुवाद |
| महाबाहो! प्राचीन काल की कथा है, महर्षि अंगिरा अपने आश्रम में रहकर घोर तप करने लगे। वे अग्नि से भी अधिक तेजस्वी बनने का प्रयत्न कर रहे थे। अपने उद्देश्य में सफल होने पर उन्होंने सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करना आरम्भ कर दिया॥8॥ |
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| Mahabaho! It is a story of ancient times, the great sage Angira started performing great penance while staying in his ashram. He was striving to become more radiant than fire. After succeeding in his aim, he started illuminating the entire world.॥ 8॥ |
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