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श्लोक 3.217.18  |
मार्कण्डेय उवाच
तच्छ्रुत्वाङ्गिरसो वाक्यं जातवेदास्तथाकरोत्।
राजन् बृहस्पतिर्नाम तस्याप्यङ्गिरस: सुत:॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| मार्कण्डेय कहते हैं- हे राजन! अंगिरा के ये वचन सुनकर अग्निदेव ने वैसा ही किया। उन्होंने उसे अपना प्रथम पुत्र स्वीकार किया। तत्पश्चात् अंगिरा के भी बृहस्पति नामक पुत्र हुए॥18॥ |
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| Markandeya says- O King! On hearing these words of Angira, Agnidev did the same. He accepted him as his first son. Then Angira also had a son named Brihaspati.॥ 18॥ |
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