श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.217.1 
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराज: कथां शुभाम्।
पुन: पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयमिदं तदा॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं: जनमेजय! धर्म से परिपूर्ण इस मंगलमयी कथा को सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय मुनि से पुनः यही प्रश्न किया। ॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! After listening to this auspicious story full of Dharma, Dharmaraja Yudhishthira again asked the sage Markandeya this question. ॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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