श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.215.4 
ब्राह्मण उवाच
पतिव्रताया: सत्याया: शीलाढॺाया यतव्रत।
संस्मृत्य वाक्यं धर्मज्ञ गुणवानसि मे मत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला - हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले पुण्यात्मा शिकारी! उस सत्यनिष्ठा और सदाचारिणी देवी के वचनों का स्मरण करके मुझे दृढ़ विश्वास हो गया है कि तुम उत्तम गुणों से युक्त हो।॥4॥
 
The Brahmin said – O virtuous hunter who observes the best fast! Remembering the words of that truthful and well-behaved goddess, I have a firm belief that you are endowed with good qualities. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)