श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.215.31 
तत: प्रत्यब्रवीद् वाक्यमृषिर्मां क्रोधमूर्च्छित:।
व्याधस्त्वं भविता क्रूर शूद्रयोनाविति द्विज॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मेरी बात सुनकर ऋषि क्रोधित हो गए और बोले, 'निर्दयी ब्राह्मण! तू शूद्र योनि में जन्म लेगा और शिकारी बनेगा।'
 
On hearing my words the sage became furious and replied, 'Merciless Brahmin! You will be born as a Shudra and will be a hunter.'
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याधसंवादविषयक

दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१५॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)